हाथी बोला—“जा बेटा जा”, साइकिल बोली—“आओ पंडित जी!”
बांदा। बुंदेलखंड की सियासत भी बड़ी दिलचस्प है। यहां मौसम बदलने में जितना वक्त नहीं लगता, उससे कम समय में नेताओं की सियासी सवारी बदल जाती है। कल तक हाथी के साथ कदमताल कर रहे मयंक द्विवेदी अब साइकिल पर सवार हो गए हैं। 19 सितंबर को लखनऊ में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में उन्होंने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। यानी हाथी से उतरकर अब साइकिल का हैंडल थाम लिया गया है और सियासी पैडल मारने की नई पारी शुरू हो गई है।
2024 के लोकसभा चुनाव में मयंक द्विवेदी बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट से बसपा के प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे थे। चुनाव में उन्हें 2.45 लाख से अधिक वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहे। उस चुनाव के दौरान उनके ब्राह्मण चेहरे और सामाजिक समीकरणों को लेकर खूब राजनीतिक चर्चा हुई थी। अब दो साल बाद सियासी तस्वीर बदल गई है। तब हाथी था, अब साइकिल है। बड़का पंडित का सवाल बस इतना है कि सवारी बदलने के साथ क्या पुराने सामाजिक समीकरण भी उसी आसानी से साइकिल पर सवार होकर साथ चले आएंगे?
राजनीति में दल बदलना कोई नई बात नहीं है। आज हाथी, कल साइकिल और कभी कोई दूसरी सवारी—सियासत में वाहन बदलते रहे हैं, नेता नई राजनीतिक पारी खेलते रहे हैं। मगर असली खेल वोटर का है। नेता पार्टी बदल सकता है, लेकिन वोटर को साथ चलने का आदेश नहीं दे सकता। मयंक जी साइकिल पर बैठ गए हैं, अब कौन वोटर साइकिल की घंटी सुनकर साथ आएगा और कौन अपना रास्ता चुनेगा, यह फैसला जनता करेगी।
लोकसभा चुनाव 2024 में जिन सामाजिक समीकरणों की खूब चर्चा हुई थी, उन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव में भी उसी रूप में लागू मान लेना शायद राजनीति का कुछ ज्यादा ही आसान गणित होगा। चुनावी मौसम बदल चुका है, राजनीतिक दलों की रणनीतियां बदल रही हैं और मतदाता के सामने मुद्दे भी बदलेंगे। इसलिए यह मान लेना कि किसी नेता के साथ उसका पूरा सामाजिक आधार भी पार्टी बदलते ही दूसरी पार्टी में स्थानांतरित हो जाएगा, लोकतंत्र के मतदाता को कुछ ज्यादा ही सरल समझना होगा।
ब्राह्मण समाज को लेकर भी चुनावी राजनीति में तरह-तरह के दावे और समीकरण सामने आते रहे हैं। लेकिन किसी भी समाज का वोट किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं होता। नेता कह सकता है कि समाज उसके साथ है, पार्टी कह सकती है कि उसका सामाजिक आधार मजबूत हो रहा है, लेकिन अंतिम निर्णय मतदान केंद्र पर मतदाता ही करता है। वह नेता का भाषण भी सुनता है, पार्टी भी देखता है, उम्मीदवार भी देखता है और अपने स्थानीय मुद्दों का हिसाब भी लगाता है। इसलिए मयंक जी के साथ कितने लोग साइकिल पर बैठेंगे, इसका हिसाब अभी कागज पर लगाना जल्दबाजी होगी।
मयंक द्विवेदी के सपा में शामिल होने से बांदा-चित्रकूट की राजनीति में चर्चा जरूर तेज हुई है। सपा को एक चर्चित स्थानीय राजनीतिक चेहरा मिला है और मयंक के सामने भी नई पार्टी में अपनी भूमिका तथा राजनीतिक प्रभाव को स्थापित करने की चुनौती है। मगर चुनावी असर का अंतिम निष्कर्ष अभी निकालना मुश्किल है। राजनीति में मंच की भीड़ अलग चीज होती है, नारे अलग चीज होते हैं, सोशल मीडिया की चर्चा अलग चीज होती है और वोट की पेटी अलग चीज।
बड़का पंडित की कलम से मयंक जी के लिए बस इतनी सी शुभकामना है—साइकिल पर बैठिए, खूब पैडल मारिए, घंटी बजाइए और नई राजनीतिक पारी का आनंद लीजिए। मगर यह उम्मीद मत रखिए कि साइकिल की घंटी बजते ही 2024 के सारे समीकरण भी दौड़ते हुए पीछे आ जाएंगे। राजनीति में नेता अपनी सवारी चुन सकता है, लेकिन वोटर अपनी मंजिल खुद चुनता है।
अब हाथी पीछे छूट गया है और साइकिल आगे बढ़ चली है। हैंडल हाथ में है, पैडल पैरों के नीचे है और रास्ता सामने है। अब देखना यही है कि साइकिल की रफ्तार कितनी रहती है, रास्ते में कितने मुसाफिर साथ आते हैं और कितने लोग चौराहे पर खड़े होकर सिर्फ हाथ हिलाकर आगे निकल जाते हैं। क्योंकि आखिर में न हाथी फैसला करेगा, न साइकिल—फैसला करेगा वोटर।
— बड़का पंडित की कलम से





