चित्रकूट। जनपद में वृद्धाश्रम संचालन के लिए संस्था के चयन की प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में आती दिखाई दे रही है। निविदा में अनुभव को लेकर निर्धारित शर्तों और चयन के दौरान अपनाए गए मानकों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब निविदा की शर्तों में सरकारी योजनाओं के तहत संचालित आवासीय संस्थानों के अनुभव के साथ निजी तौर पर संचालित आवासीय कार्यक्रमों के अनुभव को भी पात्रता के लिए शामिल किया गया था, तो मूल्यांकन के समय इन प्रावधानों को किस तरह लागू किया गया। निविदा की अनुभव संबंधी शर्त में स्पष्ट रूप से निजी रूप से संचालित आवासीय कार्यक्रमों को भी न्यूनतम तीन वित्तीय वर्षों के निरंतर संचालन के आधार पर पात्रता में विचार किए जाने का प्रावधान बताया गया है और ऐसे अनुभव के दस्तावेजों के सत्यापन की बात कही गई है। इसके बावजूद यदि किसी संस्था के अनुभव को केवल इसलिए दरकिनार किया गया कि उसके पास सरकारी कार्यादेश नहीं था, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि निजी आवासीय कार्यक्रमों के लिए निविदा में अलग प्रावधान आखिर किस उद्देश्य से रखा गया था।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वृद्धाश्रम संचालन महज किसी संस्था को काम सौंपने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें जिले के वृद्धजनों के आवास, भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा और देखभाल जैसी जिम्मेदारियां जुड़ी हैं। ऐसे में चयन की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी संस्था का वास्तविक अनुभव, उसकी कार्यक्षमता और दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी संस्था के पास वर्षों से वृद्धजन सहायता, आवासीय सामाजिक देखभाल, निराश्रित एवं बेघर लोगों के लिए आश्रय, स्वास्थ्य-पोषण तथा सामुदायिक सेवा का अनुभव है, तो उसके दस्तावेजों को किस आधार पर स्वीकार या अस्वीकार किया गया, यह स्पष्ट होना चाहिए।
चर्चा का दूसरा बड़ा विषय यह है कि क्या सभी संस्थाओं के अनुभव का मूल्यांकन एक समान मापदंड पर किया गया। क्या प्रत्येक संस्था के दस्तावेजों का समान रूप से सत्यापन किया गया, क्या निजी आवासीय अनुभव वाले आवेदकों के मामलों में RFP की उसी शर्त को लागू किया गया और क्या तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित की गई संस्थाओं को स्पष्ट रूप से बताया गया कि उन्हें किस clause और किस दस्तावेज की कमी के आधार पर बाहर किया गया। यदि इन सवालों का जवाब स्पष्ट रूप से सामने आता है तो चयन प्रक्रिया को लेकर बनी शंकाएं स्वतः दूर हो सकती हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि चयन समिति ने अनुभव के मूल्यांकन में आखिर कौन सा मापदंड अपनाया। यदि सरकारी अनुभव ही अनिवार्य था तो निजी रूप से संचालित आवासीय कार्यक्रमों को पात्रता में शामिल करने वाला प्रावधान क्यों रखा गया। और यदि निजी आवासीय अनुभव को भी मान्य किया जाना था तो उसके दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर तक किया गया। इन सवालों का जवाब चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए जरूरी है।
वृद्धाश्रम चयन को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच अब मांग उठने लगी है कि विभाग चयन प्रक्रिया की पूरी तस्वीर स्पष्ट करे। कितनी संस्थाओं ने आवेदन किया, कितनी तकनीकी रूप से पात्र पाई गईं, किन संस्थाओं को किस आधार पर बाहर किया गया, अनुभव के कितने वर्ष किस संस्था को माने गए और अंतिम चयन का आधार क्या रहा—इन सभी बिंदुओं को स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि चयन पूरी तरह नियमों और दस्तावेजों के आधार पर हुआ है तो विभाग के लिए इन तथ्यों को सामने रखना कठिन नहीं होना चाहिए।
फिलहाल सवाल किसी एक संस्था के चयन या अस्वीकृति से अधिक पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता का है। यदि नियमों की व्याख्या सभी आवेदकों के लिए समान रही है तो विवाद समाप्त हो सकता है, लेकिन यदि अलग-अलग संस्थाओं के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए जाने के प्रमाण सामने आते हैं तो मामला गंभीर हो सकता है। ऐसे में निष्पक्ष जांच ही यह साफ कर सकती है कि वृद्धाश्रम के चयन में केवल नियमों का पालन हुआ है या नियमों की आड़ में कहीं कोई ‘खेल’ भी हुआ है।





