गुरूवार, अगस्त 20, 2026
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तुलसी को केवल जयंती पर नहीं, उनकी जन्मभूमि राजापुर के गौरव में भी याद करें

चन्द्र प्रकाश द्विवेदी

गोस्वामी तुलसीदास केवल हिंदी साहित्य के महान कवि नहीं, बल्कि भारतीय लोकचेतना के ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने रामचरितमानस के माध्यम से रामकथा को जन-जन की भाषा और जीवन का हिस्सा बना दिया। उन्होंने भगवान राम को केवल आराध्य के रूप में नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया और चरित्र, मर्यादा तथा लोकमंगल का संदेश दिया। आज तुलसी जयंती के अवसर पर देशभर में गोस्वामी तुलसीदास को श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है। ऐसे अवसर पर तुलसी के साहित्य के साथ उनकी स्मृतियों से जुड़ी राजापुर, चित्रकूट की धरती को भी याद करना जरूरी है। किसी महापुरुष की स्मृति केवल प्रतिमा, जयंती या समारोह में नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और सम्मान में भी जीवित रहती है, जिससे उनका जीवन और साहित्य जुड़ा रहा है।

राजापुर और तुलसी स्मारक की ऐतिहासिक यात्रा

गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि को लेकर इतिहास में अलग-अलग मत रहे हैं। हालांकि उपलब्ध साहित्यिक एवं अभिलेखीय सामग्री में राजापुर, चित्रकूट को तुलसीदास की जन्मभूमि के रूप में स्वीकार किए जाने का उल्लेख मिलता है। साहित्यकार एवं शोधकर्ता राम गणेश पाण्डेय ‘साहित्यरत्न’ के शोधग्रंथ ‘तुलसी जन्मभूमि शोध समीक्षा’ में अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर राजापुर को तुलसी की जन्मभूमि मानने को तर्कसंगत बताया गया है। राजापुर में तुलसी स्मारक की यात्रा भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार वर्ष 1906 में अंग्रेज शासन के अधिकारियों द्वारा राजापुर में तुलसी स्मारक का निरीक्षण किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्मारक की जर्जर स्थिति देखकर तुलसी की कुटी की मरम्मत के लिए 700 रुपये के सरकारी अनुदान का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 1908 में राजापुर के तत्कालीन पोस्टमास्टर बाबा रेवती लाल द्वारा पक्के मंदिर के निर्माण के लिए चंदा जुटाए जाने की बात सामने आती है। इस प्रयास में विभिन्न समुदायों के लोगों द्वारा सहयोग किए जाने का भी उल्लेख है। इसके बाद 1945 में हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थायी समिति द्वारा राजापुर में तुलसी स्मारक के संबंध में प्रस्ताव स्वीकार किए जाने का उल्लेख मिलता है। हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल सांकृत्यायन सहित अनेक साहित्यकारों, पत्रकारों और तुलसी प्रेमियों द्वारा राजापुर की यात्राएं भी की गईं। फिर आया वह महत्वपूर्ण पड़ाव जब 15 अप्रैल 1955 को तुलसी स्मारक समिति का गठन हुआ। उपलब्ध सामग्री के अनुसार समिति के अध्यक्ष पंडित गोविंद बल्लभ पंत थे और डॉ. सम्पूर्णानंद सहित अनेक प्रमुख व्यक्तियों की इसमें भूमिका रही। 1957 में राजापुर में तुलसी स्मारक की आधारशिला रखी गई। बाद में स्मारक भवन का निर्माण हुआ, जिस पर उस समय लगभग 21 लाख रुपये खर्च होने का उल्लेख है। यह स्मारक केवल एक भवन की योजना नहीं थी। इसकी परिकल्पना में तुलसी साहित्य का संग्रह, तुलसी विषयक सामग्री का संग्रहालय, शोध और तुलसी साहित्य के अनुशीलन की व्यवस्था भी शामिल थी। 31 मई 1960 को भारतीय हिंदी परिषद के तत्वावधान में दिल्ली में देशभर के विद्वानों की गोष्ठी आयोजित होने का उल्लेख मिलता है। इसमें राजापुर, चित्रकूट को तुलसी जन्मभूमि स्वीकार किए जाने तथा राजापुर में निर्मित तुलसी स्मारक के उद्घाटन के लिए भारत सरकार से अनुरोध किए जाने की बात सामने आती है। स्मारक का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया जाना प्रस्तावित था, लेकिन उनके न आ पाने के कारण तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सी.बी. गुप्ता द्वारा स्मारक का उद्घाटन किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी क्रम में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल मोतीलाल बोरा द्वारा तुलसी तीर्थ राजापुर में तुलसी शोध संस्थान के निर्माण और तुलसी साहित्य पर शोध के लिए 25 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत किए जाने का भी उल्लेख है, हालांकि प्रकाशित सामग्री के अनुसार यह धनराशि राजापुर तक नहीं पहुंच सकी।
इतिहास के ये प्रसंग बताते हैं कि राजापुर में तुलसी की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का प्रयास किसी एक समय या किसी एक व्यक्ति की पहल नहीं था। इसके पीछे साहित्यकारों, विद्वानों, स्थानीय लोगों और शासन स्तर पर लंबे प्रयासों की एक परंपरा रही है।
तुलसी की भाषा से राजापुर के विकास तक
तुलसीदास की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनकी भाषा भी शामिल है। रामचरितमानस की भाषा को केवल संस्कृतनिष्ठ या किसी एक क्षेत्र की भाषा के रूप में देखना तुलसी की रचनात्मकता को सीमित करना होगा। उपलब्ध शोध में बताया गया है कि मानस की भाषा में अवधी के साथ संस्कृत, भोजपुरी, बुंदेली, ब्रजभाषा, बघेली, उर्दू तथा अरबी-फारसी से आए शब्दों के साथ अनेक देशज और स्थानीय शब्दों का भी प्रयोग मिलता है।
यही भाषा तुलसी को जनकवि बनाती है। उन्होंने साहित्य को केवल विद्वानों की चौखट पर नहीं रखा, बल्कि ऐसी भाषा में लिखा जिसे सामान्य व्यक्ति सुन सके, समझ सके और अपने जीवन से जोड़ सके। राजापुर की भौगोलिक स्थिति भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। प्रकाशित शोध में राजापुर को बुंदेलखंड और अवध क्षेत्र की भाषायी-सांस्कृतिक सीमाओं के बीच स्थित क्षेत्र बताते हुए यहां की स्थानीय भाषायी विविधता का उल्लेख किया गया है। मानस में प्रयुक्त कुछ देशज और स्थानीय शब्दों को भी राजापुर तथा उसके आसपास के क्षेत्र से जोड़कर देखने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसलिए तुलसी का अध्ययन केवल उनके जन्म और जीवन की घटनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी भाषा, लोकजीवन और उनके समय की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का अध्ययन भी राजापुर और चित्रकूट की धरती से जुड़कर किया जाना चाहिए।


राजापुर का इतिहास केवल तुलसी तक सीमित नहीं है। उपलब्ध सामग्री में यमुना के रास्ते राजापुर के पुराने व्यापारिक संपर्कों का भी उल्लेख मिलता है। कालिंदी के रास्ते व्यापारिक गतिविधियों और दूरस्थ क्षेत्रों से संपर्क की चर्चा सामने आती है। आज तुलसी की नगरी के सामने विकास और पर्यटन से जुड़े अनेक सवाल हैं। यदि राजापुर को व्यवस्थित सांस्कृतिक और साहित्यिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए तो तुलसी स्मारक, तुलसी मंदिर, यमुना तट और उनसे जुड़ी अन्य स्मृतियों को एक व्यापक सांस्कृतिक परिपथ से जोड़ा जा सकता है।
इसी दिशा में 31 जुलाई 2025 को 528वीं तुलसी जयंती के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजापुर आगमन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। मुख्यमंत्री ने तुलसी जन्म कुटीर में पूजा-अर्चना की, वहां सुरक्षित हस्तलिखित श्रीरामचरितमानस के दर्शन किए और तुलसी साहित्य समागम में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने राजापुर में यमुना तट पर रिवर फ्रंट विकसित करने तथा राजापुर-कर्वी मार्ग के दोहरीकरण की घोषणा भी की।
मुख्यमंत्री का यह दौरा केवल एक धार्मिक अथवा साहित्यिक आयोजन नहीं था। इससे यह संदेश भी सामने आया कि तुलसी की स्मृतियों से जुड़ी इस नगरी को सांस्कृतिक विरासत के साथ विकास और पर्यटन की दृष्टि से भी आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। राजापुर में यमुना के कटान से बचाव, दर्शनार्थियों के लिए बेहतर यातायात और क्षेत्र के विकास से जुड़ी घोषणाएं इसी व्यापक सोच का हिस्सा हैं। तुलसी जयंती पर हम हर वर्ष तुलसी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हैं, कार्यक्रम करते हैं, भाषण देते हैं और उनकी चौपाइयां पढ़ते हैं। लेकिन क्या इतना ही पर्याप्त है?
यदि तुलसी ने लोकभाषा को सम्मान दिया, तो हमें अपनी लोकभाषाओं और बोलियों का सम्मान करना होगा। यदि तुलसी ने मर्यादा को जीवन का आधार बनाया, तो हमें सार्वजनिक जीवन में मर्यादा को महत्व देना होगा। यदि तुलसी ने साहित्य को जन-जन तक पहुंचाया, तो हमें उनके साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। और यदि राजापुर तुलसी की स्मृतियों और साहित्यिक विरासत से जुड़ी नगरी है, तो उसे केवल तुलसी जयंती के दिन याद करने के बजाय पूरे वर्ष उसकी सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप विकसित करना होगा।


तुलसी किसी एक व्यक्ति, संस्था, समाज या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। तुलसी भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत हैं।
इसलिए आज तुलसी जयंती पर राजापुर से एक संकल्प निकलना चाहिए—तुलसी को केवल जयंती पर याद नहीं करेंगे, उनके साहित्य को पढ़ेंगे, उनकी भाषा को समझेंगे, उनकी मर्यादा को जीवन में उतारेंगे और उनकी स्मृतियों से जुड़ी राजापुर नगरी के गौरव, संरक्षण और विकास के लिए आवाज उठाएंगे। तुलसी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनकी रचनाएं केवल पुस्तकों और आयोजनों तक सीमित न रहें, बल्कि उनके विचार हमारे जीवन और समाज में दिखाई दें। और उनकी स्मृतियों से जुड़ी राजापुर की धरती आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, संस्कृति, साहित्य और पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सके। यही तुलसी जयंती की सच्ची सार्थकता होगी।

लेखक – चन्द्र प्रकाश द्विवेदी, सचिव, तुलसीदास शिक्षा एवं विकाश समिति शोध संस्थान, चित्रकूट

C P Dwivedi
C P Dwivedihttps://sarasbhavna.com
लेखक परिचय : चन्द्र प्रकाश द्विवेदी, चित्रकूट निवासी एक सक्रिय पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक विचारक हैं, जो पिछले दो दशकों से हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘सरस भावना’ के संपादक के रूप में जनपक्षीय पत्रकारिता कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों से की और अपने लेखन तथा संपादन कौशल से बुंदेलखंड की पत्रकारिता को नई दिशा दी। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.), कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री (M.Sc. CS), सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर (MSW), पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिग्री, और क़ानूनी ज्ञान में स्नातक (L.L.B.) की शिक्षा प्राप्त की है। वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं — एक संवेदनशील पत्रकार, प्रतिबद्ध समाजसेवी, करियर काउंसलर, राजनीतिक विश्लेषक, अधिवक्ता और व्यंग्यकार। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि परिवर्तन और ग्रामीण विकास जैसे जनहित से जुड़े विषयों पर निरंतर काम कर रहे हैं। वर्तमान में वे बुंदेली प्रेस क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और सरकार से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार हैं। लेखन नाम बड़का पंडित‘’ के नाम से वे राजनीतिक पाखंड, जातिवाद, दिखावटी विकास, मीडिया के पतन और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखे, मगर प्रभावशाली व्यंग्य लिखते हैं, जो समाज को सोचने और बदलाव के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी न सिर्फ व्यंग्य का माध्यम है, बल्कि बुंदेलखंड की पीड़ा, चेतना और संघर्ष की आवाज़ भी हैऔर शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
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