मंगलवार, जून 9, 2026
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“कुर्सी छोड़िए प्रधान जी, संविधान बुला रहा है!” कार्यकाल खत्म, अधिकार खत्म: हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

लखनऊ/चित्रकूट

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में हो रही देरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार और संबंधित आयोगों से कड़ा जवाब तलब किया है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि ग्राम प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक बनाकर पुनः कार्यभार सौंपना संवैधानिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243-E के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल निश्चित है और उसके समाप्त होने के बाद चुनाव समय से कराना राज्य की जिम्मेदारी है।

गौरतलब है कि प्रदेश की अधिकांश ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है। इसके बाद राज्य सरकार द्वारा जारी शासनादेश में पूर्व ग्राम प्रधानों को ही पंचायतों का प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था की गई थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने इस व्यवस्था की वैधता पर गंभीर प्रश्न उठाए।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण निर्धारण के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट लंबित होने के कारण पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं हो सका। इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि आरक्षण से संबंधित प्रक्रिया चुनाव कार्यक्रम से पहले पूरी की जानी चाहिए थी और अंतिम समय में इसे चुनाव टालने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि पूर्व प्रधानों को प्रशासक के रूप में केवल छह माह की सीमित अवधि के लिए नियुक्त किया गया है तथा राज्य निर्वाचन आयोग 10 जून तक नई मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पूरी कर लेगा।

हालांकि अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए राज्य निर्वाचन आयोग और ओबीसी आयोग दोनों को निर्देश दिया है कि वे 10 जुलाई 2026 तक विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि पंचायत चुनाव कराने के लिए अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।

अदालत ने संकेत दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का संचालन संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही होना चाहिए और चुनावों में अनावश्यक विलंब स्वीकार्य नहीं है।

अब पूरे प्रदेश की नजर 10 जुलाई की अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां यह स्पष्ट हो सकेगा कि पंचायत चुनावों का रास्ता कब तक साफ होता है और गांवों की सत्ता फिर से जनता के मत से तय होगी या नहीं।

C P Dwivedi
C P Dwivedihttps://sarasbhavna.com
लेखक परिचय : चन्द्र प्रकाश द्विवेदी, चित्रकूट निवासी एक सक्रिय पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक विचारक हैं, जो पिछले दो दशकों से हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘सरस भावना’ के संपादक के रूप में जनपक्षीय पत्रकारिता कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों से की और अपने लेखन तथा संपादन कौशल से बुंदेलखंड की पत्रकारिता को नई दिशा दी। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.), कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री (M.Sc. CS), सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर (MSW), पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिग्री, और क़ानूनी ज्ञान में स्नातक (L.L.B.) की शिक्षा प्राप्त की है। वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं — एक संवेदनशील पत्रकार, प्रतिबद्ध समाजसेवी, करियर काउंसलर, राजनीतिक विश्लेषक, अधिवक्ता और व्यंग्यकार। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि परिवर्तन और ग्रामीण विकास जैसे जनहित से जुड़े विषयों पर निरंतर काम कर रहे हैं। वर्तमान में वे बुंदेली प्रेस क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और सरकार से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार हैं। लेखन नाम बड़का पंडित‘’ के नाम से वे राजनीतिक पाखंड, जातिवाद, दिखावटी विकास, मीडिया के पतन और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखे, मगर प्रभावशाली व्यंग्य लिखते हैं, जो समाज को सोचने और बदलाव के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी न सिर्फ व्यंग्य का माध्यम है, बल्कि बुंदेलखंड की पीड़ा, चेतना और संघर्ष की आवाज़ भी हैऔर शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
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