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सूचना का अधिकार या इंतजार का अधिकार? चित्रकूट में RTI पर ताला: 58 में 26 आवेदन बिना जवाब, पारदर्शिता पर गंभीर सवाल

30 दिन की समयसीमा बेअसर, प्रमुख विभागों में चुप्पी; अपील के बाद भी नहीं मिल रही राहत

चित्रकूट। लोकतंत्र में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बना Right to Information Act, 2005 चित्रकूट में अपने मूल उद्देश्य से भटकता नजर आ रहा है। जिले के सामाजिक कार्यकर्ता चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा दायर आरटीआई आवेदनों के आंकड़े इस व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को उजागर कर रहे हैं।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा अब तक कुल 58 आरटीआई आवेदन दाखिल किए गए, जिनमें से 26 पर निर्धारित 30 दिनों की समयसीमा के भीतर कोई जवाब नहीं दिया गया। यह स्थिति न केवल कानून के उल्लंघन को दर्शाती है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

आंकड़ों के अनुसार 24 आवेदनों को निस्तारित किया गया है, जबकि 6 मामलों को अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों को स्थानांतरित कर दिया गया। एक आवेदन आंशिक रूप से निपटाया गया, जबकि एक मामले में भुगतान अब भी लंबित है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कई मामलों में जानकारी देने के बजाय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने या अधूरा रखने का तरीका अपनाया जा रहा है।

जिले के कई अहम विभाग—नगर निकाय, श्रम विभाग, लोक निर्माण विभाग और परिवहन—सूचना उपलब्ध कराने में पीछे नजर आ रहे हैं। इन विभागों से जुड़े मामलों में आवेदक ने विकास कार्यों की गुणवत्ता, भुगतान प्रक्रिया, ठेकेदारी व्यवस्था, पंजीकरण और सेवाओं से संबंधित जानकारियां मांगी थीं, लेकिन या तो जवाब नहीं मिला या अधूरी जानकारी देकर औपचारिकता पूरी कर दी गई।

मामला केवल आवेदन तक सीमित नहीं है। प्रथम अपील के स्तर पर भी स्थिति संतोषजनक नहीं दिखती। चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा दायर 24 प्रथम अपीलों में से केवल 10 का ही निस्तारण हो पाया है, जबकि बाकी अपीलें अब भी लंबित हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि समस्या केवल सूचना देने में देरी तक सीमित नहीं, बल्कि शिकायत निवारण प्रणाली भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित आरटीआई ऑनलाइन पोर्टल का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन वर्तमान आंकड़े यह दर्शाते हैं कि जमीनी स्तर पर इस व्यवस्था में अभी भी सुधार की जरूरत है।

चंद्र प्रकाश द्विवेदी का कहना है कि “अगर समयसीमा के भीतर सूचना नहीं मिलती और अपील के बाद भी समाधान नहीं होता, तो आम नागरिकों के लिए सूचना का अधिकार केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाता है।”

निष्कर्ष:

चित्रकूट में आरटीआई की मौजूदा स्थिति यह दर्शाती है कि पारदर्शिता का यह महत्वपूर्ण कानून स्थानीय स्तर पर अपेक्षित प्रभाव नहीं डाल पा रहा है। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो यह व्यवस्था “सूचना के अधिकार” से ज्यादा “सूचना के इंतजार” में बदलती चली जाएगी।

C P Dwivedi
C P Dwivedihttps://sarasbhavna.com
लेखक परिचय : चन्द्र प्रकाश द्विवेदी, चित्रकूट निवासी एक सक्रिय पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक विचारक हैं, जो पिछले दो दशकों से हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘सरस भावना’ के संपादक के रूप में जनपक्षीय पत्रकारिता कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों से की और अपने लेखन तथा संपादन कौशल से बुंदेलखंड की पत्रकारिता को नई दिशा दी। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.), कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री (M.Sc. CS), सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर (MSW), पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिग्री, और क़ानूनी ज्ञान में स्नातक (L.L.B.) की शिक्षा प्राप्त की है। वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं — एक संवेदनशील पत्रकार, प्रतिबद्ध समाजसेवी, करियर काउंसलर, राजनीतिक विश्लेषक, अधिवक्ता और व्यंग्यकार। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि परिवर्तन और ग्रामीण विकास जैसे जनहित से जुड़े विषयों पर निरंतर काम कर रहे हैं। वर्तमान में वे बुंदेली प्रेस क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और सरकार से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार हैं। लेखन नाम बड़का पंडित‘’ के नाम से वे राजनीतिक पाखंड, जातिवाद, दिखावटी विकास, मीडिया के पतन और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखे, मगर प्रभावशाली व्यंग्य लिखते हैं, जो समाज को सोचने और बदलाव के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी न सिर्फ व्यंग्य का माध्यम है, बल्कि बुंदेलखंड की पीड़ा, चेतना और संघर्ष की आवाज़ भी हैऔर शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
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