चन्द्र प्रकाश द्विवेदी, सचिव, तुलसीदास शिक्षा एवं विकाश समिति शोध संस्थान, चित्रकूट
गोस्वामी तुलसीदास भारतीय साहित्य और लोकचेतना के ऐसे महाकवि हैं, जिनका प्रभाव केवल उनके समय तक सीमित नहीं रहा। रामचरितमानस जैसी कालजयी रचना ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाया और भगवान श्रीराम के चरित्र को भारतीय जनमानस में मर्यादा, आदर्श और लोकमंगल के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। साढ़े चार शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी तुलसीदास की रचनाओं की लोकप्रियता कम नहीं हुई। इसका सबसे बड़ा कारण उनकी कथा के साथ उनकी सहज, मुहावरेदार और जीवंत भाषा रही, जिसने साहित्य को विद्वानों की सीमा से निकालकर सामान्य जन के जीवन का हिस्सा बना दिया।
तुलसीदास के जीवन के संबंध में इतिहास और लोकपरंपरा दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। उनके जन्मस्थान, माता-पिता और गोत्र आदि के बारे में स्पष्ट और निर्विवाद प्रमाण उपलब्ध नहीं होने की बात PDF में कही गई है। हालांकि हिंदी के अनेक विद्वानों और साहित्यकारों ने वर्तमान चित्रकूट जिले के राजापुर को तुलसीदास की जन्मभूमि माना है। शोधकर्ता राम गणेश पाण्डेय ने भी अपने शोध में अभिलेखीय प्रमाणों और कुछ शाही सनदों तथा फरमानों के आधार पर राजापुर को तुलसी की जन्मभूमि मानने को अधिक तर्कसंगत बताया है।
उपलब्ध सामग्री के अनुसार तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी बताया गया है। राजापुर से जुड़ी साहित्यिक परंपरा में इन्हीं के घर तुलसीदास के जन्म का उल्लेख मिलता है।
तुलसीदास का बाल्यकाल सामान्य सुख-सुविधाओं में नहीं बीता। इतिहासकारों के मत के अनुसार कहा गया है कि बाल्यावस्था में ही वे अपने माता-पिता के संरक्षण से वंचित हो गए और चित्रकूट के निकट साधु-संतों के आश्रय में रहकर अपना जीवन व्यतीत किया। बाद में वे अपने गुरु के साथ सोरों सहित काशी आदि स्थानों पर गए और विद्या का अध्ययन किया। इस प्रकार बचपन से ही उनका जीवन साधु-संतों, धार्मिक वातावरण और अध्ययन-साधना से जुड़ गया।
विद्यार्जन के बाद तुलसीदास के जीवन में गृहस्थ अवस्था का भी एक दौर आया। डॉ. माताप्रसाद गुप्त के मत का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि संभवतः वे कुछ समय राजापुर में गृहस्थ जीवन में भी रहे। लेकिन गृहस्थ जीवन से विरक्ति के बाद उनका अधिकांश समय चित्रकूट में बीता। इसके बाद वे समय-समय पर अयोध्या, चित्रकूट और काशी में प्रवास करते रहे और अंततः काशी को अपना स्थायी निवास बनाया। वहीं उन्होंने अपने जीवन की अंतिम लीला पूरी की।
तुलसीदास के जीवन को समझने में चित्रकूट की भूमिका विशेष महत्वपूर्ण दिखाई देती है। चित्रकूट की प्राचीन धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा का विस्तार से वर्णन है। वाल्मीकि, अत्रि, अनसूया, दत्तात्रेय, भृगु, पतंजलि और अनेक संत-महात्माओं की साधना से चित्रकूट को जोड़ा गया है। राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास से भी चित्रकूट का गहरा संबंध बताया गया है। इसी कारण चित्रकूट तुलसीदास की साधना और साहित्यिक चेतना के लिए भी महत्वपूर्ण भूमि बन गया।
तुलसीदास की भक्ति केवल विचार नहीं थी, वह उनके दैनिक जीवन और आचरण में भी दिखाई देती थी। राजापुर के हनुमान मंदिर से जुड़ी एक लोकमान्यता के अनुसार तुलसीदास प्रतिदिन हनुमानजी के दर्शन और पूजन के लिए जाते थे। वर्षा के दिनों में नदी-नालों में बाढ़ के कारण जब वे मंदिर नहीं पहुंच पाते थे, तब लोकश्रुति के अनुसार हनुमानजी ने स्वप्न में उन्हें अपनी कुटिया के पास एकांत स्थान पर पूजा करने का संकेत दिया। इसके बाद तुलसीदास द्वारा वहां नियमित पूजा किए जाने की परंपरा बताई जाती है।
तुलसीदास की साधना और रामभक्ति का चरम उनके साहित्य में दिखाई देता है। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना श्रीरामचरितमानस है। यह केवल रामकथा का पुनर्कथन नहीं, बल्कि भारतीय समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना को प्रभावित करने वाला महाकाव्य बन गया। तुलसी ने राम के चरित्र को मर्यादा, आदर्श, त्याग, करुणा और लोकमंगल से जोड़ा। इसी कारण रामचरितमानस केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं रही, बल्कि भारतीय जनजीवन का हिस्सा बन गई।
तुलसी की महानता का सबसे बड़ा पक्ष उनकी भाषा भी है। जिस समय संस्कृत विद्वानों और शास्त्रों की भाषा मानी जाती थी, तुलसीदास ने रामकथा को ऐसी भाषा में प्रस्तुत किया जिसे सामान्य जनता समझ सके। डॉ. रविशंकर पाण्डेय के अध्ययन के अनुसार मानस की भाषा में अवधी के साथ संस्कृत, भोजपुरी, बुंदेली, ब्रजभाषा, बघेली, उर्दू और अरबी-फारसी से आए शब्दों के साथ अनेक देशज और स्थानीय शब्द भी मिलते हैं।
यही कारण है कि तुलसीदास केवल किसी एक क्षेत्र के कवि नहीं रहे। राजापुर की भौगोलिक स्थिति बुंदेलखंड और अवध क्षेत्र के बीच होने के कारण वहां की भाषायी विविधता का प्रभाव भी दिखाई देता है। रामचरितमानस में ऐसे देशज और स्थानीय शब्द मिलते हैं, जो राजापुर और उसके आसपास के क्षेत्र में प्रचलित रहे हैं और जिनका प्रयोग दूसरे क्षेत्रों में बहुत कम मिलता है।
रामचरितमानस की प्रतिष्ठा और तुलसी की अद्भुत भक्ति
रामचरितमानस की लोकप्रियता बढ़ने के साथ तुलसीदास को विरोध और आलोचना का सामना भी करना पड़ा। काशी से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोकपरंपरा का वर्णन है। इसमें कहा गया है कि कुछ विद्वान तुलसीदास की बढ़ती प्रसिद्धि से ईर्ष्या करने लगे और रामचरितमानस की श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाया गया। अंततः उसकी श्रेष्ठता की परीक्षा काशी विश्वनाथ के समक्ष किए जाने की कथा सामने आती है।
लोकमान्यता के अनुसार अनेक ग्रंथों के साथ रामचरितमानस को काशी विश्वनाथ मंदिर में रखा गया। अगले दिन मंदिर के पट खुले तो रामचरितमानस सबसे ऊपर मिली और उसके मुखपृष्ठ पर “सत्यम् शिवम् सुन्दरम्” लिखे होने की बात कही गई है। इस घटना के बाद तुलसी और उनकी रचना की प्रतिष्ठा और बढ़ने की कथा मिलती है।
इसी के साथ तुलसीदास के जीवन से जुड़ी एक और लोककथा सामने आती है। जब कुछ लोगों ने रामचरितमानस को नष्ट करने या चोरी कराने का प्रयास किया तो दो चोर तुलसी की कुटिया के पास पहुंचे। वहां उन्होंने दो धनुष-बाणधारी युवकों को पहरा देते देखा। डरकर वे लौट गए और बाद में तुलसीदास के पास जाकर पूरा वृत्तांत बताया। तुलसीदास ने इसे प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण की कृपा माना। उन दोनों चोरों के जीवन में परिवर्तन आया और वे रामभक्ति में लग गए—यह प्रसंग लोकपरंपरा के रूप में वर्णित है।
तुलसीदास की रचनाओं में हनुमान चालीसा का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हनुमान चालीसा को तुलसीदास की रचना बताया गया है और इसके पीछे एक लोकप्रचलित प्रसंग का उल्लेख है। काशी में उनके निवास के दौरान एक ऐसे कमरे में रहने की बात कही गई है जहां प्रेत के रहने की चर्चा थी। एक दिन तुलसीदास को उस प्रेत के दर्शन हुए और बाद की कथा में हनुमान चालीसा की रचना से उसका संबंध बताया गया है। उसकी चौपाइयों के पाठ से प्रेत को मुक्ति मिलने की लोकमान्यता भी दर्ज है।
आज हनुमान चालीसा भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक हिस्सों में श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ी जाती है। तुलसीदास की यह रचना उनकी रामभक्ति और हनुमान के प्रति उनकी गहरी आस्था का लोकप्रिय प्रतीक बन चुकी है।
तुलसीदास के साहित्य की एक बड़ी विशेषता यह है कि उसमें केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि जीवन और समाज के अनेक पक्षों का चित्रण मिलता है। उन्होंने राम के चरित्र के माध्यम से शासन, समाज, कर्तव्य, संबंध, नीति, मित्रता, शत्रुता और लोकव्यवहार जैसे विषयों को भी अभिव्यक्ति दी। इसी कारण रामचरितमानस को केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में सीमित करना उसके व्यापक प्रभाव को कम करके देखना होगा।
तुलसीदास का संबंध चित्रकूट से भी गहराई से जुड़ा रहा। चित्रकूट को उनके जीवन की महत्वपूर्ण साधना-भूमि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। राजापुर, चित्रकूट और काशी उनके जीवन की यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे। अंततः काशी उनका स्थायी निवास बना और वहीं उनका जीवन समाप्त हुआ।
राजापुर में तुलसी की स्मृति को सुरक्षित रखने के लिए बाद के समय में स्मारक निर्माण का भी प्रयास हुआ। 1906 में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा तुलसी स्मारक का निरीक्षण किए जाने, 1908 में पक्के मंदिर के लिए चंदा जुटाए जाने और 1945 में हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा स्मारक संबंधी प्रस्ताव स्वीकार किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 15 अप्रैल 1955 को तुलसी स्मारक समिति का गठन हुआ और 1957 में स्मारक की आधारशिला रखी गई।
तुलसी स्मारक की परिकल्पना केवल एक भवन बनाने तक सीमित नहीं थी। इसमें तुलसी साहित्य तथा तुलसी विषयक सामग्री का संग्रहालय, शोध और तुलसी साहित्य के अनुशीलन की व्यवस्था करने की योजना थी। स्मारक भवन के निर्माण में उस समय लगभग 21 लाख रुपये खर्च होने का उल्लेख मिलता है।
1955 में बनी समिति के प्रयासों से स्मारक निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी और 1960 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सी.बी. गुप्ता द्वारा इसके उद्घाटन का उल्लेख मिलता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा उद्घाटन किया जाना प्रस्तावित था, लेकिन उनके न आ पाने के कारण मुख्यमंत्री सी.बी. गुप्ता ने इसका उद्घाटन किया। तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल बोरा द्वारा तुलसी शोध संस्थान के लिए 25 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत किए जाने, लेकिन वह धनराशि राजापुर तक न पहुंच पाने का भी उल्लेख है।
इस प्रकार तुलसीदास का जीवन केवल एक कवि के जीवन की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे बालक की यात्रा है जिसने कठिन परिस्थितियों से निकलकर साधु-संतों की संगति, गुरु की शिक्षा, अध्ययन, साधना और रामभक्ति के रास्ते स्वयं को तैयार किया और आगे चलकर ऐसा साहित्य रचा जिसने भारतीय समाज की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया।
तुलसीदास ने अपने समय की भाषा को अपनाया, लेकिन उसमें ऐसी शक्ति पैदा की कि वह भाषा समय और भूगोल की सीमाएं पार कर गई। उन्होंने संस्कृत के ज्ञान को लोक की भाषा से जोड़ा। उन्होंने रामकथा को जनभाषा में उतारा और उसे घर-घर तक पहुंचाया। यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक क्रांति थी।
आज जब हम तुलसीदास को याद करते हैं तो केवल उनकी जन्मतिथि या जयंती मनाना पर्याप्त नहीं है। उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश यह है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह समाज तक पहुंचे, भक्ति तभी सार्थक है जब वह आचरण में दिखाई दे और साहित्य तभी अमर होता है जब वह लोकजीवन का हिस्सा बन जाए।
तुलसीदास ने यह तीनों काम करके दिखाए।
उनका जीवन संघर्ष से शुरू हुआ, साधना से आगे बढ़ा और साहित्य के माध्यम से अमर हो गया। उनके सामने परिस्थितियां थीं, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को अपने मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने राम को अपना केंद्र बनाया और उसी केंद्र से ऐसी साहित्यिक धारा प्रवाहित की, जिसने उत्तर भारत ही नहीं, पूरे भारतीय समाज को प्रभावित किया।
आज भी जब किसी घर में रामचरितमानस का पाठ होता है, जब किसी मंदिर में हनुमान चालीसा की चौपाइयां गूंजती हैं, जब रामलीला के मंच पर राम का चरित्र सामने आता है या जब कोई व्यक्ति तुलसी की चौपाई के माध्यम से जीवन का अर्थ खोजता है, तब कहीं न कहीं तुलसीदास की वही साधना जीवित दिखाई देती है।
तुलसीदास इसलिए अमर नहीं हुए कि उन्होंने केवल एक महान ग्रंथ लिखा। वे इसलिए अमर हुए क्योंकि उन्होंने अपने साहित्य में भारत के लोकजीवन, उसकी आस्था, उसकी भाषा, उसकी मर्यादा और उसके आदर्शों को आवाज दी। यही कारण है कि आज भी तुलसीदास केवल एक कवि नहीं हैं—वे भारतीय लोकमानस की जीवित परंपरा हैं।
तुलसी को पढ़ना एक महाकवि को पढ़ना है, तुलसी को समझना भारतीय समाज की आत्मा को समझना है और तुलसी के जीवन से सीखना यह है कि संघर्षों के बीच भी साधना, ज्ञान और लोकमंगल का रास्ता चुना जा सकता है।
यही गोस्वामी तुलसीदास की सबसे बड़ी जीवन-कथा है—संघर्ष से साधना तक, साधना से रामभक्ति तक और रामभक्ति से अमर लोकचेतना तक की यात्रा।



