चन्द्र प्रकाश द्विवेदी
सरस भावना । चित्रकूट
चित्रकूट समेत प्रदेश के सभी जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर बढ़ती राजनीतिक हलचल के बीच अब यह सवाल सिर्फ गलियारों तक सीमित नहीं रहा कि अगला अध्यक्ष कौन होगा, बल्कि यह सवाल ज़्यादा गहरा हो गया है कि आखिर इस कुर्सी तक पहुंचने की कीमत क्या है। बाहर से यह पद सम्मान और सेवा का प्रतीक लगता है, लेकिन अंदरखाने यह कुर्सी धीरे-धीरे महंगे निवेश का रूप ले चुकी है।
पंचायत राजनीति से जुड़े जानकार बताते हैं कि अध्यक्ष बनने की तैयारी चुनाव की घोषणा से कई महीने पहले शुरू हो जाती है। इस दौरान सबसे पहले गणित बैठाया जाता है, कौन जिला पंचायत सदस्य किस ओर है, कौन नाराज़ है और किसे मनाया जा सकता है। यही वह दौर होता है जहां बैठकों, संपर्क, यात्रा, आवभगत और रणनीतिक खर्च के नाम पर बड़ी रकम खर्च होने लगती है। यह खर्च कहीं दर्ज नहीं होता, लेकिन हर राजनीतिक खिलाड़ी इसे सामान्य प्रक्रिया मानता है।
सूत्रों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में भी यह शुरुआती खर्च लाखों में नहीं, बल्कि करोड़ के करीब पहुंच जाता है। यदि मुकाबला कड़ा हो और दो-तीन मज़बूत दावेदार मैदान में हों, तो यह खर्च डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक पहुंचने की चर्चा आम है। यही वजह है कि पंचायत राजनीति अब सेवा से ज़्यादा आर्थिक क्षमता और पहुंच का खेल बनती जा रही है।
चुनाव जीतने के साथ यह कहानी खत्म नहीं होती, बल्कि असली दबाव वहीं से शुरू होता है। खर्च की गई रकम की भरपाई की चिंता अध्यक्ष बनने के बाद लगातार बनी रहती है। इसी दौर में विकास योजनाओं, बजट आवंटन और कार्यों की प्राथमिकता पर असर पड़ने की बातें सामने आती हैं। सड़क, नाली, भवन और मरम्मत जैसे काम अब सिर्फ ज़रूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि रिकवरी के हिसाब से तय होने लगते हैंकृऐसा आरोप ग्रामीण इलाकों में आम है।
पिछले कार्यकालों के अनुभवों पर नज़र डालें तो एक पैटर्न साफ दिखता है। कई बार वही ठेकेदार, वही फर्म और वही नाम अलग-अलग योजनाओं में दोहराए जाते हैं। काग़ज़ों में काम पूरे हो जाते हैं, लेकिन ज़मीन पर अधूरे रास्ते, टूटी नालियां और बार-बार मरम्मत मांगती सड़कें गांव वालों की शिकायत बन जाती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि “काम फाइल में पूरा हो जाता है, गांव में नहीं।”
इस पूरे समीकरण में प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी का असर भी साफ दिखाई देता है। पंचायत से जुड़े जानकार बताते हैं कि जिस पार्टी की सरकार प्रदेश में होती है, जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में उसी पार्टी के समर्थित या उसके नज़दीक माने जाने वाले चेहरे को स्वाभाविक बढ़त मिल जाती है। अधिकारी उसी दिशा में सहज दिखते हैं, योजनाओं की मंज़ूरी, बजट का प्रवाह और फाइलों की रफ्तार सत्ता के अनुरूप ढल जाती है। यही कारण है कि कई जिला पंचायत सदस्य अंतिम समय में सत्ता के साथ खड़ा होना सुरक्षित दांव मानते हैं।
सत्ता के साथ-साथ अधिकारी तंत्र की भूमिका भी पंचायत राजनीति में अहम मानी जाती है। अध्यक्ष बदलते ही प्रशासनिक व्यवहार में भी बदलाव दिखने लगता है। किस प्रस्ताव पर पहले हस्ताक्षर होंगे, किस फाइल को प्राथमिकता मिलेगी और किस योजना को तेज़ी से आगे बढ़ाया जाएगाकृइन सवालों के जवाब अक्सर राजनीतिक समीकरण से जुड़े होते हैं। यही वजह है कि जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव केवल प्रतिनिधियों का नहीं, बल्कि यह तय करता है कि पूरा सिस्टम किस दिशा में चलेगा।
इस बीच सबसे बड़ा सवाल जनता बनाम सत्ता का खड़ा होता है। ग्रामीण इलाकों में यह धारणा आम होती जा रही है कि विकास जनता की ज़रूरत से ज़्यादा सत्ता की प्राथमिकता के हिसाब से तय होता है। जिन क्षेत्रों के प्रतिनिधि सत्ता के करीब होते हैं, वहां योजनाओं की रफ्तार तेज़ दिखती है, जबकि बाकी इलाकों में फाइलें महीनों अटकी रहती हैं। लोग कहते हैं कि पंचायत चुनाव में वोट गांव देता है, लेकिन विकास की चाबी अक्सर सत्ता के पास रहती है।
यही सवाल यह भी उठाता है कि यदि प्रदेश की सत्ता बदली तो जिला पंचायत अध्यक्ष की ताकत पर क्या असर पड़ता है। जानकारों के मुताबिक सत्ता परिवर्तन के साथ अध्यक्ष या तो और मज़बूत हो जाता है या फिर केवल औपचारिक मुखिया बनकर रह जाता है। सत्ता से तालमेल रखने वाला अध्यक्ष प्रशासनिक सहयोग और बजट में बढ़त पाता है, जबकि सत्ता से दूर माने जाने वाले अध्यक्ष को कई बार संघर्ष करना पड़ता है।
इसी कारण यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या जिला पंचायत अध्यक्ष वास्तव में निर्णय लेने की ताकत रखता है या वह सिर्फ सिस्टम की मुहर बनकर रह जाता है। काग़ज़ों में अधिकार शीर्ष पर होते हैं, लेकिन व्यवहार में कई फैसले पहले से तय रास्तों पर चलते हैं। अध्यक्ष कई बार निर्णायक कम और अनुमोदनकर्ता ज़्यादा नज़र आता है, और यही कारण है कि कई वादे पूरे नहीं हो पाते।
ग्रामीण इलाकों में लोगों से बातचीत में एक बात बार-बार सामने आती है
जब कुर्सी इतनी महंगी होगी, तो ईमानदारी और पारदर्शिता की उम्मीद करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि कई अच्छे और साफ-सुथरी छवि वाले लोग इस दौड़ से खुद को दूर रखते हैं। पंचायत राजनीति में वही चेहरे आगे आते हैं, जिनके पास पैसा, नेटवर्क और सिस्टम की समझ होती है।
चित्रकूट में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर चल रही मौजूदा चर्चा इसलिए सिर्फ पद की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की दिशा को लेकर है। लोग अब नाम नहीं पूछ रहे, बल्कि यह जानना चाहते हैं कि अगला अध्यक्ष सिस्टम के साथ बह जाएगा या जनता के सवालों के साथ खड़ा होगा। कुर्सी की कीमत कम होगी या पंचायत की राजनीति और महंगी ही असली सवाल है।





