नया साल आया है।
चित्रकूट में अपार भीड़ है,
कड़ाके की ठंड है,
कोहरा इतना कि
सामने आदमी नहीं दिखता—
पर अव्यवस्था फिर भी साफ़ दिखती है।
राम घाट भरा पड़ा है,
कामदगिरि परिक्रमा में
पाँव रखने की जगह नहीं।
श्रद्धालु काँप रहा है,
और सिस्टम
गरम कम्बल में बैठा है।
इसी ठंड और भीड़ के बीच
चित्रकूट धाम में
एक अनोखी सभा हुई—
बंदरों की सभा।
पीपल के नीचे बैठक लगी।
अध्यक्ष वही बंदर बना
जो साल भर यात्रियों के सामान ले भागता है
केला, लाई नहीं,
पूरी थैली उठाने के लिए जाना जाता है।
पहला प्रस्ताव पास हुआ—
“नये साल में
यात्रियों को
बंदरों को कुछ नहीं देना है।”
सभा में सन्नाटा छा गया।
एक बूढ़ा बंदर बोला—
“ठीक है।
कम से कम अब
हमारे नाम पर
इंसानों का पेट तो नहीं भरेगा।”
दूसरा प्रस्ताव आया—
‘बंदर सेवा समिति’।
नाम बड़ा,
पोस्टर रंगीन,
दान पेटी तैयार।
एक नौजवान बंदर बोला—
“अगर हमें कुछ नहीं मिलेगा,
तो हमारे नाम पर
ये धंधा क्यों?”
पीछे से जवाब आया—
“सेवा भावना।”
बंदर ने पूछा—
“तो भावना
हमारे पेट तक
क्यों नहीं पहुँचती?”
सभा में हँसी गूँज गई।
बंदर बोले—
“हम सिर्फ घाटों की समस्या नहीं हैं।
हम तो अब
पूरे ज़िले में हैं—
हर गाँव, हर टोला।” हर जगह हमारी पहुंच है।
खपरैल की छतें उखड़ रही हैं,
किसानो के अनाज लुट रहा है,
गांव के बच्चे डर रहे हैं,
बुज़ुर्ग पहरा दे रहे हैं।
देना मना है,
पर न देना भी सुरक्षित नहीं—
क्योंकि बंदर
मांगते नहीं,
जबरदस्ती लेते हैं।
शहर में वही बंदर
आस्था कहलाता है,
गाँव में वही बंदर
आतंक।
शिकायत करो तो
एक ही जवाब—
“बंदर संरक्षित हैं।”
सभा में सवाल उठा—
“अगर हम संरक्षित हैं,
तो गाँव क्यों असुरक्षित हैं?”
उधर परिक्रमा में
दुकानदार दाम बढ़ाकर पुण्य बेच रहा है,
समाजसेवी कैमरा आगे रखकर
सेवा गिन रहा है,
और नेता
ठंड में भी
वोट की गर्मी खोज रहा है।
सभा के अंत में
अध्यक्ष बंदर ने घोषणा की—
“हे इंसानो!
हम जानवर हैं,
न भाषण जानते हैं,
न पोस्टर।
अगर सच में सेवा करनी है,
तो दिखावा छोड़ो।
और अगर दिखावा ही करना है,
तो कम से कम
हमारे नाम पर मत करो।”
सभा खत्म हुई।
बंदर पेड़ों पर लौट गए।
इंसान
नये साल के जश्न में
पुराने खेल के साथ रह गया।
क्योंकि
चित्रकूट में
नया साल भले आ जाए,
पर सबसे मुश्किल काम आज भी वही है—
ईमानदार ज़िम्मेदारी।
बड़का पंडित





