मंगलवार, जनवरी 27, 2026
होमबड़का पंडित की बकैतीजब नया साल आया और बंदरों ने इंसानों की पोल खोल दी

जब नया साल आया और बंदरों ने इंसानों की पोल खोल दी

नया साल आया है।
चित्रकूट में अपार भीड़ है,
कड़ाके की ठंड है,
कोहरा इतना कि
सामने आदमी नहीं दिखता—
पर अव्यवस्था फिर भी साफ़ दिखती है।

राम घाट भरा पड़ा है,
कामदगिरि परिक्रमा में
पाँव रखने की जगह नहीं।
श्रद्धालु काँप रहा है,
और सिस्टम
गरम कम्बल में बैठा है।

इसी ठंड और भीड़ के बीच
चित्रकूट धाम में
एक अनोखी सभा हुई—
बंदरों की सभा।

पीपल के नीचे बैठक लगी।
अध्यक्ष वही बंदर बना
जो साल भर यात्रियों के सामान ले भागता है
केला, लाई नहीं,
पूरी थैली उठाने के लिए जाना जाता है।

पहला प्रस्ताव पास हुआ—

“नये साल में
यात्रियों को
बंदरों को कुछ नहीं देना है।”

सभा में सन्नाटा छा गया।
एक बूढ़ा बंदर बोला—
“ठीक है।
कम से कम अब
हमारे नाम पर
इंसानों का पेट तो नहीं भरेगा।”

दूसरा प्रस्ताव आया—
‘बंदर सेवा समिति’।
नाम बड़ा,
पोस्टर रंगीन,
दान पेटी तैयार।

एक नौजवान बंदर बोला—
“अगर हमें कुछ नहीं मिलेगा,
तो हमारे नाम पर
ये धंधा क्यों?”

पीछे से जवाब आया—
“सेवा भावना।”
बंदर ने पूछा—
“तो भावना
हमारे पेट तक
क्यों नहीं पहुँचती?”

सभा में हँसी गूँज गई।

बंदर बोले—
“हम सिर्फ घाटों की समस्या नहीं हैं।
हम तो अब
पूरे ज़िले में हैं—
हर गाँव, हर टोला।” हर जगह हमारी पहुंच है।

खपरैल की छतें उखड़ रही हैं,
किसानो के अनाज लुट रहा है,
गांव के बच्चे डर रहे हैं,
बुज़ुर्ग पहरा दे रहे हैं।
देना मना है,
पर न देना भी सुरक्षित नहीं—
क्योंकि बंदर
मांगते नहीं,
जबरदस्ती लेते हैं।

शहर में वही बंदर
आस्था कहलाता है,
गाँव में वही बंदर
आतंक।

शिकायत करो तो
एक ही जवाब—
“बंदर संरक्षित हैं।”
सभा में सवाल उठा—
“अगर हम संरक्षित हैं,
तो गाँव क्यों असुरक्षित हैं?”

उधर परिक्रमा में
दुकानदार दाम बढ़ाकर पुण्य बेच रहा है,
समाजसेवी कैमरा आगे रखकर
सेवा गिन रहा है,
और नेता
ठंड में भी
वोट की गर्मी खोज रहा है।

सभा के अंत में
अध्यक्ष बंदर ने घोषणा की—

“हे इंसानो!
हम जानवर हैं,
न भाषण जानते हैं,
न पोस्टर।

अगर सच में सेवा करनी है,
तो दिखावा छोड़ो।
और अगर दिखावा ही करना है,
तो कम से कम
हमारे नाम पर मत करो।”

सभा खत्म हुई।
बंदर पेड़ों पर लौट गए।
इंसान
नये साल के जश्न में
पुराने खेल के साथ रह गया।

क्योंकि
चित्रकूट में
नया साल भले आ जाए,
पर सबसे मुश्किल काम आज भी वही है—
ईमानदार ज़िम्मेदारी।

बड़का पंडित

C P Dwivedi
C P Dwivedihttps://sarasbhavna.com
लेखक परिचय : चन्द्र प्रकाश द्विवेदी, चित्रकूट निवासी एक सक्रिय पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक विचारक हैं, जो पिछले दो दशकों से हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘सरस भावना’ के संपादक के रूप में जनपक्षीय पत्रकारिता कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों से की और अपने लेखन तथा संपादन कौशल से बुंदेलखंड की पत्रकारिता को नई दिशा दी। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.), कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री (M.Sc. CS), सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर (MSW), पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिग्री, और क़ानूनी ज्ञान में स्नातक (L.L.B.) की शिक्षा प्राप्त की है। वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं — एक संवेदनशील पत्रकार, प्रतिबद्ध समाजसेवी, करियर काउंसलर, राजनीतिक विश्लेषक, अधिवक्ता और व्यंग्यकार। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि परिवर्तन और ग्रामीण विकास जैसे जनहित से जुड़े विषयों पर निरंतर काम कर रहे हैं। वर्तमान में वे बुंदेली प्रेस क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और सरकार से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार हैं। लेखन नाम बड़का पंडित‘’ के नाम से वे राजनीतिक पाखंड, जातिवाद, दिखावटी विकास, मीडिया के पतन और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखे, मगर प्रभावशाली व्यंग्य लिखते हैं, जो समाज को सोचने और बदलाव के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी न सिर्फ व्यंग्य का माध्यम है, बल्कि बुंदेलखंड की पीड़ा, चेतना और संघर्ष की आवाज़ भी हैऔर शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
RELATED ARTICLES

Leave a reply

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

- Advertisment -

Most Popular